सफलता की कहानी

३ idiots का "Aall izz well " नारा तो आजकल हर जुबान पर है..पर मैं आपका ध्यान इसी फिल्म की एक और लाइन पे लाना चाहती हूँ..
सफलता के पीछे मत भागो..काबिल बनो..सफलता अपना आप पीछे आयेगी..
तो यह कहानी है दो लड़कों की..और उनके जीवन की..

मैं नहीं जानती की उनमें क्या सम्बन्ध था..
दोस्त थे या भाई..
पडोसी थे या सिर्फ अजनबी..
स्कूल जब जाते थे पढने ..
तो सब यही कहते की ये दोनों कुछ कर दिखायेंगे..
इनमें वो लगन और प्रतिभा है कुछ बनने की..
समय बीता और उन्होंने अपने अपने जीवन में आगे बढ़ना जारी रक्खा..

पहला बहुत विवेक वाला और भावनात्मक था..
उसे दुनिया के नियमों को तोल-परख के चलना अच्छा लगता था..
हर किसी की मदद करना..
सबसे मधुरता से बात करना..
यही उसके गुण थे..
वह किसी काम को इसलिए नहीं करता की लोग उसकी वाह-वाही करेंगे..
या उसका सम्मान करेंगे..
वह तो काम को विधाता की आज्ञा मान कर करता था..
और इसी में उसे संतोष था..
पढाई ख़त्म होने पर उसे नौकरी मिली..
और वह उससे संतुष्ट भी था..
परन्तु वही दुनिया के चोंचले..
पैसा कम है..
मतलब सम्मान कम है..
पहले तो वह सबकी बात अनसुनी करके अपने आदर्शो पे चलता रहा..
पर बार बार आलोचना सुनने से तो पेड़ भी मुरझा जाते हैं..
और जो नहीं होना था वो होने लगा..
उसे भी सम्मान और दुनियादारी में फसने का लालच आने लगा..
वह छोड़ के अपने पक्के पथ को पगडण्डी पर मुड़ने लगा..
पर देखिये तो उसकी अच्छाई का फल..
जिन्हें वह आज तक समझाता आया आज वह दौड़े चले आये..
बोले..
यह किस राह पे चलने जा रहे हो?
वह ठहरा..
अपने आप को खंगाला..
और पाया की आखिर इस दुनियादारी ने उसे भी नहीं छोड़ा..
अब नहीं सुनेगा वह इन आलोचनाओं को..
और नहीं बढेगा इस लालच के पीछे..
अरे बेमतलब तो जानवर भी शिकार नहीं करता...
तो मैं क्यों बनू ऐसा?
मेरा लक्ष्य ऐशो-आराम नहीं है..
मेहनत की कमाई से ही संतुष्टि मिलेगी..
जो मेरे अपनों की मुस्कुरुहत में झलकेगी..
इसी निश्चय के साथ वह चला..
और आज भी एक सुख भरा जीवन व्यतीत कर रहा है..
जिसमे आलीशान बंगले नहीं मुस्कुराते घर है...

अरे कहा चले आप..दूसरे  के बारे में नहीं सुनेंगे..

थी तो उसमे भी कमी नहीं..
पर वह दिखावे और प्रशंसा का आदि था..
उसे किसी से कम दिखना पसंद न था..
तो जब उसकी पढाई पूरी हुई..
उसे भी नौकरी मिली..
पर बात वही थी..
पैसा ज्यादा नहीं था..
और गम बस यही था..
न होगा पैसा..
तो न होगा बड़ा घर..
न होगी अच्छी गाड़ी..
न कोई पूछेगा..
न कोई उसकी चालीसा पढने वाला होगा..
इसी बात पे दुनिया ने उसे भटकाया..
वह घबराया..
हाथ पाँव मारे..
और 'सम्मानजनक' जीवन की इच्छा ने उससे हर जगह घुमाया..
पर कहते है न..
ढूढने पर तो भगवान् भी मिलते है..
तो आई पांच चिट्ठियां..
सबमें लिखा था यही..
की नौकरी की तलाश में हो जो..
वो मिलने आये अभी..
पर इससे उसमे उल्लास नहीं घमंड घुस आया..
वह लगा छांटने सबसे अच्छा..
जहाँ हो धन-वर्षा..
नहीं गया वह बाकि चार में..
लगा अपना सीना तानने..
और पहुंचा वह भरपूर जोश में उस पैसों की खदान में..
पर उसकी अकड़ को कोई बर्दाश्त न कर पाया..
जो अफसर बैठा था उसे परखने..
वह खुद को छोटा महसूस करने लगा..
और बोला माफ़ कीजिये पर आपके लिए ज़िन्दगी में कुछ इससे भी बड़ा है लिखा..
पर वो 'इससे भी बड़ा' आयेगा कब??
अब कैसे जाये वापस घर..
जो बाकि थी चिट्ठियां..
उनका तो वह खुद ही मजाक बना चुका था..
और क्यूंकि न कभी किसी को पुछा..
न किसी को अपना समझा..
तो आज कोई न था उसका धीरज बंधाने..
जो भी थे ढोंगी साथी..
वे लगे चढाने..
अरे इसमें क्या है..
तुझे तो अभी बहुत ऊपर जाना है..
एक ठोकर से कुछ नहीं रुकता..
पर उस गलती से शिक्षा न लेना..
तो उसकी सबसे बड़ी भूल थी..

तो आज भी है वह उस धन-वृक्ष की तलाश में..
और अगर आप भी है..
तो सोचिये की क्या करेंगे ऐसे पैसे का..
जिसकी ख़ुशी को कोई बांटने वाला न हो..
क्यूंकि तब तक लालच ने तो अपने छीन ही लिए होंगे..

तो मेरी आप सबसे एक ही प्रार्थना है..
की चाहे आपकी जो भी अकान्शाएं हो..
लेकिन अपने जीवन में चीजों का संग्रह नहीं लोगों को साथ रखिये..
क्यूंकि
ठोकरे तो सभी ने खायी है..
पर संभला वही जिसे अपनों ने संभाला..

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