वो उटपटांग शिक्षक

वो उटपटांग शिक्षक था जिसने..
न कभी अपने प्रिय शिष्यों को कुछ सिखाया..
न खुद कभी कुछ सीखा..

हाथो में वो दम था की किसी की भी नाक तोड़ दे..
पर दिमाग में इतना भी नहीं की बच्चो पे अपना प्रभाव छोड़ सके..
सारे साल पढ़ाता रहा वह वही दो पन्ने..
और बोले..
बच्चों पढ़ो अब अपने मन से..

फिर आया परीक्षा का दिन..
सब डरे रहे..
की क्या पढ़े और क्या नहीं..
फिर भी सबने अपने दिमागों में तफरी मचा दी..
और पहुंचे पूरे जोश में..

पर जब हाथ में आया पर्चा..
तो माथा ठनका..
लगे सर पीटने...
यह भी कोई पेपर बनाया..
नामुमकिन था एक घंटे में करना..
और नक़ल करना बेकार..
क्यूंकि नहीं आता किसी को भी वो सवाल..
जो दिया है किसी किताब से छाप के आज..

कोई नहीं हम तो फिर से मेहनत करके पास होने की कोशिश कर लेंगे..
पर निवेदन है उनसे..
की न सनके वो कापियां जांचने के साथ!!

सफलता की कहानी

३ idiots का "Aall izz well " नारा तो आजकल हर जुबान पर है..पर मैं आपका ध्यान इसी फिल्म की एक और लाइन पे लाना चाहती हूँ..
सफलता के पीछे मत भागो..काबिल बनो..सफलता अपना आप पीछे आयेगी..
तो यह कहानी है दो लड़कों की..और उनके जीवन की..

मैं नहीं जानती की उनमें क्या सम्बन्ध था..
दोस्त थे या भाई..
पडोसी थे या सिर्फ अजनबी..
स्कूल जब जाते थे पढने ..
तो सब यही कहते की ये दोनों कुछ कर दिखायेंगे..
इनमें वो लगन और प्रतिभा है कुछ बनने की..
समय बीता और उन्होंने अपने अपने जीवन में आगे बढ़ना जारी रक्खा..

पहला बहुत विवेक वाला और भावनात्मक था..
उसे दुनिया के नियमों को तोल-परख के चलना अच्छा लगता था..
हर किसी की मदद करना..
सबसे मधुरता से बात करना..
यही उसके गुण थे..
वह किसी काम को इसलिए नहीं करता की लोग उसकी वाह-वाही करेंगे..
या उसका सम्मान करेंगे..
वह तो काम को विधाता की आज्ञा मान कर करता था..
और इसी में उसे संतोष था..
पढाई ख़त्म होने पर उसे नौकरी मिली..
और वह उससे संतुष्ट भी था..
परन्तु वही दुनिया के चोंचले..
पैसा कम है..
मतलब सम्मान कम है..
पहले तो वह सबकी बात अनसुनी करके अपने आदर्शो पे चलता रहा..
पर बार बार आलोचना सुनने से तो पेड़ भी मुरझा जाते हैं..
और जो नहीं होना था वो होने लगा..
उसे भी सम्मान और दुनियादारी में फसने का लालच आने लगा..
वह छोड़ के अपने पक्के पथ को पगडण्डी पर मुड़ने लगा..
पर देखिये तो उसकी अच्छाई का फल..
जिन्हें वह आज तक समझाता आया आज वह दौड़े चले आये..
बोले..
यह किस राह पे चलने जा रहे हो?
वह ठहरा..
अपने आप को खंगाला..
और पाया की आखिर इस दुनियादारी ने उसे भी नहीं छोड़ा..
अब नहीं सुनेगा वह इन आलोचनाओं को..
और नहीं बढेगा इस लालच के पीछे..
अरे बेमतलब तो जानवर भी शिकार नहीं करता...
तो मैं क्यों बनू ऐसा?
मेरा लक्ष्य ऐशो-आराम नहीं है..
मेहनत की कमाई से ही संतुष्टि मिलेगी..
जो मेरे अपनों की मुस्कुरुहत में झलकेगी..
इसी निश्चय के साथ वह चला..
और आज भी एक सुख भरा जीवन व्यतीत कर रहा है..
जिसमे आलीशान बंगले नहीं मुस्कुराते घर है...

अरे कहा चले आप..दूसरे  के बारे में नहीं सुनेंगे..

थी तो उसमे भी कमी नहीं..
पर वह दिखावे और प्रशंसा का आदि था..
उसे किसी से कम दिखना पसंद न था..
तो जब उसकी पढाई पूरी हुई..
उसे भी नौकरी मिली..
पर बात वही थी..
पैसा ज्यादा नहीं था..
और गम बस यही था..
न होगा पैसा..
तो न होगा बड़ा घर..
न होगी अच्छी गाड़ी..
न कोई पूछेगा..
न कोई उसकी चालीसा पढने वाला होगा..
इसी बात पे दुनिया ने उसे भटकाया..
वह घबराया..
हाथ पाँव मारे..
और 'सम्मानजनक' जीवन की इच्छा ने उससे हर जगह घुमाया..
पर कहते है न..
ढूढने पर तो भगवान् भी मिलते है..
तो आई पांच चिट्ठियां..
सबमें लिखा था यही..
की नौकरी की तलाश में हो जो..
वो मिलने आये अभी..
पर इससे उसमे उल्लास नहीं घमंड घुस आया..
वह लगा छांटने सबसे अच्छा..
जहाँ हो धन-वर्षा..
नहीं गया वह बाकि चार में..
लगा अपना सीना तानने..
और पहुंचा वह भरपूर जोश में उस पैसों की खदान में..
पर उसकी अकड़ को कोई बर्दाश्त न कर पाया..
जो अफसर बैठा था उसे परखने..
वह खुद को छोटा महसूस करने लगा..
और बोला माफ़ कीजिये पर आपके लिए ज़िन्दगी में कुछ इससे भी बड़ा है लिखा..
पर वो 'इससे भी बड़ा' आयेगा कब??
अब कैसे जाये वापस घर..
जो बाकि थी चिट्ठियां..
उनका तो वह खुद ही मजाक बना चुका था..
और क्यूंकि न कभी किसी को पुछा..
न किसी को अपना समझा..
तो आज कोई न था उसका धीरज बंधाने..
जो भी थे ढोंगी साथी..
वे लगे चढाने..
अरे इसमें क्या है..
तुझे तो अभी बहुत ऊपर जाना है..
एक ठोकर से कुछ नहीं रुकता..
पर उस गलती से शिक्षा न लेना..
तो उसकी सबसे बड़ी भूल थी..

तो आज भी है वह उस धन-वृक्ष की तलाश में..
और अगर आप भी है..
तो सोचिये की क्या करेंगे ऐसे पैसे का..
जिसकी ख़ुशी को कोई बांटने वाला न हो..
क्यूंकि तब तक लालच ने तो अपने छीन ही लिए होंगे..

तो मेरी आप सबसे एक ही प्रार्थना है..
की चाहे आपकी जो भी अकान्शाएं हो..
लेकिन अपने जीवन में चीजों का संग्रह नहीं लोगों को साथ रखिये..
क्यूंकि
ठोकरे तो सभी ने खायी है..
पर संभला वही जिसे अपनों ने संभाला..

मुझे इतना गुस्सा क्यों आता है??

whats the reason of anger? when you don't get the things done in the manner, no matter its right or wrong, we tend to build anger..and in our anger we almost leave our senses unused..and the worst could be that we hurt ourselves or even damage things...
and do you think any technique can reduce it??one can only avoid situations which arise anger..
for example...right now suppose..i m in peak of my anger..and i try to count 1-10
1 2 3 4.....aah forget it!!
anger is definitely a wrong side of personality of most of us..but what if we get violent in the anger...its no doubt that we know that we are doing wrong and will regret doing it later...but all this is after the scene is over..how can i control my anger when i m angry..so that i don't trouble people much with my anger and frustration...
so i thought upon it..may be i should keep myself occupied all the time so that i don't get the time for destructive ideas..may be i should change my way of thinking all over...
but obviously i want to change myself..my anger...and don't want to hurt people for whom i care for..neither i want to hurt  myself..
so if anyone of u can help me..please do that!!

Will you marry me?

They were not strangers but they were not friends either...
Slowly and likely they became fond of each other..
The common friends felt their chemistry..
And they were not wrong..
Even they both felt it..

Then the day of confession came..
In the springs of beautiful and bright flowers..
He hesitantly said his words..
The music floated..
Cupid struck them right..

With all cute and lovely talks..
Their story continued..
But it was time to apart..
Their hearts exchanged and souls still together..
The two promised their long life relation..

The distance they couldnt resist..
And he proposed to get married..
But her consent wasnt enough..
Their parents need to look up..
For their approval..


It was a time of celebration..
All were happy for their relation..
The families met for interaction..
But the things need to hold up for sometime..
As both of them wanted to achieve things in life..


Now duties and stature took place of love..
Tension prevailed..
Fights full-fledged arranged..
You dont understand me..
You dont care for me..

Then there came a time...
When they had to re-think their life..
Although the materialism replaced their world..
Love was somewhere still present..
And before the things could go worse..


He asked her again..
Will you marry me??


This is dedicated to all those who are trying hard to convert their love marriage into an arranged marriage..then how the things over-shadow the main reason of togetherness- Love..